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Munauwar Rana - Haa.n Ijazat Hai Agar Koi Kahani Aor Hai

हाँ इजाज़त है अगर कोई कहानी और है 

इन कटोरों में अभी थोड़ा सा पानी और है 

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मज़हबी मज़दूर सब बैठे हैं इन को काम दो 

एक इमारत शहर में काफ़ी पुरानी और है 

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ख़ामुशी कब चीख़ बन जाए किसे मालूम है 

ज़ुल्म कर लो जब तलक ये बे-ज़बानी और है 

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ख़ुश्क पत्ते आँख में चुभते हैं काँटों की तरह 

दश्त में फिरना अलग है बाग़बानी और है 

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फिर वही उक्ताहटें होंगी बदन चौपाल में 

उम्र के क़िस्से में थोड़ी सी जवानी और है 

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बस इसी एहसास की शिद्दत ने बूढ़ा कर दिया 

टूटे-फूटे घर में इक लड़की सियानी और है 

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  • 16-Jul-2017
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Munauwar Rana - Kisi Ko Ghar Mila Hisse Me Ya Koi Duka.n Aai

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई 

मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में माँ आई 

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यहाँ से जाने वाला लौट कर कोई नहीं आया 

मैं रोता रह गया लेकिन न वापस जा के माँ आई 

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अधूरे रास्ते से लौटना अच्छा नहीं होता 

बुलाने के लिए दुनिया भी आई तो कहाँ आई 

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किसी को गाँव से परदेस ले जाएगी फिर शायद 

उड़ाती रेल-गाड़ी ढेर सारा फिर धुआँ आई 

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मिरे बच्चों में सारी आदतें मौजूद हैं मेरी 

तो फिर इन बद-नसीबों को न क्यूँ उर्दू ज़बाँ आई 

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क़फ़स में मौसमों का कोई अंदाज़ा नहीं होता 

ख़ुदा जाने बहार आई चमन में या ख़िज़ाँ आई 

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घरौंदे तो घरौंदे हैं चटानें टूट जाती हैं 

उड़ाने के लिए आँधी अगर नाम-ओ-निशाँ आई 

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कभी ऐ ख़ुश-नसीबी मेरे घर का रुख़ भी कर लेती 

इधर पहुँची उधर पहुँची यहाँ आई वहाँ आई 

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  • 16-Jul-2017
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Munauwar Rana - Ana Hawas Ki Dukaano.n Me Aake Baith Gayi

अना हवस की दुकानों में आ के बैठ गई 

अजीब मैना है शिकरों में आ के बैठ गई 

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जगा रहा है ज़माना मगर नहीं खुलतीं 

कहाँ की नींद इन आँखों में आ के बैठ गई 

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वो फ़ाख़्ता जो मुझे देखते ही उड़ती थी 

बड़े सलीक़े से बच्चों में आ के बैठ गई 

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तमाम तल्ख़ियाँ साग़र में रक़्स करने लगीं 

तमाम गर्द किताबों में आ के बैठ गई 

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तमाम शहर में मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू है यही 

कि शाहज़ादी ग़ुलामों में आ के बैठ गई 

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नहीं थी दूसरी कोई जगह भी छुपने की 

हमारी उम्र खिलौनों में आ के बैठ गई 

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उठो कि ओस की बूँदें जगा रही हैं तुम्हें 

चलो कि धूप दरीचों में आ के बैठ गई 

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चली थी देखने सूरज की बद-मिज़ाजी को 

मगर ये ओस भी फूलों में आ के बैठ गई 

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तुझे मैं कैसे बताऊँ कि शाम होते ही 

उदासी कमरे के ताक़ों में आ के बैठ गई 

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  • 16-Jul-2017
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Munauwar Rana - Aap ko chehre se bhi beemar hona chahiye

आप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए 

इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए 

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आप दरिया हैं तो फिर इस वक़्त हम ख़तरे में हैं 

आप कश्ती हैं तो हम को पार होना चाहिए 

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ऐरे-ग़ैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों 

आप को औरत नहीं अख़बार होना चाहिए 

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ज़िंदगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें 

टूटा-फूटा ही सही घर-बार होना चाहिए 

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अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दे मुझे 

इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए 

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  • 16-Jul-2017
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Adil Lucknowi - Ae budhape tera nishaan hai ham

Ae budhape tera nishaan hai ham

Teer gayab hai aur kamaan hai ham

Aur jism se budhe-budhe lagte hai

Aur jazbaat se jawaan hai ham

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Unke daddy ki lab ki cigarette hai

Unki mummy ke paandaan hai ham

Unke gham ka pahaad uthayen hai

Dekhne ko to khaan-pan hai ham

  • 16-Jul-2017
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Adil Lucknowi - Kya jawaani mein khel khele hai

Kya jawaani mein khel khele hai

Ab budhape mein ham akele hai

Mehfil-e-gul rukhan mein rehte the

Ham bhi kaise jahaan mein rehte the

Haye kaisa badal gaya hai manzar

Aaena thookta hai ab munh par

Dil to kehta hai naujawaan hai ham

Aaj bhi ‘Teesmaar Khan’ hai ham

Ham par kar ghaas dalata hi nahi

Bhoorhe bakre ko paalta hi nahi

Sone chaandi ke yeh badan waale

Hai ajab aafaton ke par kaale

Haan pe jeete the, na pe marte the

Ab ke soorat bigad gayi apni

Kaisi dukaan ujadh gayi apni

Ab ‘Chacha’ keh ke yeh bulate hai

Saanp seene pe lot jaate hai

Ho ke maayus in haseenon se

Aa gaye ham utar ke jeenon se

Jab budhape ka aitlaaf kiya

Naujawaani ka sui chaak kiya

Bazm-e-khoonkah se jab nikaale gaye

Doore bhi us taraf ko daale gaye

Aisi paivash pe nazar thehri

Tajurbe mein jo bahut thi gehri

Kuch tabiyat se bhi woh saada thi

Umr uski zara si ziyadah thi

Socha tha aarzoo nikal jaaye

Daal aapni yahan to gal jaaye

Par wahan bhi bhikhar gaya sapna

Sara gur mitti ho gaya apna

Paintra kya badal gayi woh bhi

Bhai keh kar nikal gayi woh bhi

Ae haseeno na ab tarsao

Hai buddhe par kuch taras khayo

Ujde baalon se na tum ghabrayo

Chandni hai kareeb aa jaao

Aur chehre ke sabt kya dekhte ho

Dhele aankhon ke phainkte kya ho

Jhurriya kam kaamdaani hai

Iske peeche wohi jawaani hai

Laakh ham buddhe ho gaye to kya

Jhurriyon mein samoh gaya to kya

Kal jo rakhte the aaj bhi rakhte hai

Aashiqana mizaaj rakhte hai

  • 16-Jul-2017
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Allama Iqbal - Tujhe yaad kya nahi hai mere dil ka wo zamana

तुझे याद क्या नहीं है मिरे दिल का वो ज़माना 

वो अदब-गह-ए-मोहब्बत वो निगह का ताज़ियाना 

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ये बुतान-ए-अस्र-ए-हाज़िर कि बने हैं मदरसे में 

न अदा-ए-काफ़िराना न तराश-ए-आज़राना 

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नहीं इस खुली फ़ज़ा में कोई गोशा-ए-फ़राग़त 

ये जहाँ अजब जहाँ है न क़फ़स न आशियाना 

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रग-ए-ताक मुंतज़िर है तिरी बारिश-ए-करम की 

कि अजम के मय-कदों में न रही मय-ए-मुग़ाना 

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मिरे हम-सफ़ीर इसे भी असर-ए-बहार समझे 

उन्हें क्या ख़बर कि क्या है ये नवा-ए-आशिक़ाना 

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मिरे ख़ाक ओ ख़ूँ से तू ने ये जहाँ किया है पैदा 

सिला-ए-शहीद क्या है तब-ओ-ताब-ए-जावेदाना 

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तिरी बंदा-परवरी से मिरे दिन गुज़र रहे हैं 

न गिला है दोस्तों का न शिकायत-ए-ज़माना 

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  • 16-Jul-2017
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Allama Iqbal - Dil soz se khali hai nigah paak nahi hai

दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है 

फिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है 

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है ज़ौक़-ए-तजल्ली भी इसी ख़ाक में पिन्हाँ 

ग़ाफ़िल तू निरा साहिब-ए-इदराक नहीं है 

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वो आँख कि है सुर्मा-ए-अफ़रंग से रौशन 

पुरकार ओ सुख़न-साज़ है नमनाक नहीं है 

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क्या सूफ़ी ओ मुल्ला को ख़बर मेरे जुनूँ की 

उन का सर-ए-दामन भी अभी चाक नहीं है 

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कब तक रहे महकूमी-ए-अंजुम में मिरी ख़ाक 

या मैं नहीं या गर्दिश-ए-अफ़्लाक नहीं है 

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बिजली हूँ नज़र कोह ओ बयाबाँ पे है मेरी 

मेरे लिए शायाँ ख़स-ओ-ख़ाशाक नहीं है 

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आलम है फ़क़त मोमिन-ए-जाँबाज़ की मीरास 

मोमिन नहीं जो साहिब-ए-लौलाक नहीं है 

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  • 16-Jul-2017
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Allama Iqbal - Ameen-e-raaz hai mardan-e-hoor ki darveshi

अमीन-ए-राज़ है मर्दान-ए-हूर की दरवेशी 

कि जिबरईल से है उस को निस्बत-ए-ख़्वेशी 

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किसे ख़बर कि सफ़ीने डुबो चुकी कितने 

फ़क़ीह ओ सूफ़ी ओ शाइर की ना-ख़ुश-अंदेशी 

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निगाह-ए-गर्म कि शेरों के जिस से होश उड़ जाएँ 

न आह-ए-सर्द कि है गोसफ़ंदी ओ मेशी 

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तबीब-ए-इश्क़ ने देखा मुझे तो फ़रमाया 

तिरा मरज़ है फ़क़त आरज़ू की बे-नीशी 

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वो शय कुछ और है कहते हैं जान-ए-पाक जिसे 

ये रंग ओ नम ये लहू आब ओ नाँ की है बेशी 

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  • 16-Jul-2017
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Allama Iqbal - Aflak se aata hai naalo.n ka jawab aakhir

अफ़्लाक से आता है नालों का जवाब आख़िर 

करते हैं ख़िताब आख़िर उठते हैं हिजाब आख़िर 

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अहवाल-ए-मोहब्बत में कुछ फ़र्क़ नहीं ऐसा 

सोज़ ओ तब-ओ-ताब अव्वल सोज़ ओ तब-ओ-ताब आख़िर 

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मैं तुझ को बताता हूँ तक़दीर-ए-उमम क्या है 

शमशीर-ओ-सिनाँ अव्वल ताऊस-ओ-रुबाब आख़िर 

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मय-ख़ाना-ए-यूरोप के दस्तूर निराले हैं 

लाते हैं सुरूर अव्वल देते हैं शराब आख़िर 

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क्या दबदबा-ए-नादिर क्या शौकत-ए-तैमूरी 

हो जाते हैं सब दफ़्तर ग़र्क़-ए-मय-ए-नाब आख़िर 

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ख़ल्वत की घड़ी गुज़री जल्वत की घड़ी आई 

छुटने को है बिजली से आग़ोश-ए-सहाब आख़िर 

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था ज़ब्त बहुत मुश्किल इस सैल-ए-मआ'नी का 

कह डाले क़लंदर ने असरार-ए-किताब आख़िर 

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  • 16-Jul-2017
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