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Parveen Shakir - Agarche Tujh se Bahot Ikhtelaaf Bhi Na Hua

अगरचे तुझ से बहुत इख़्तिलाफ़ भी न हुआ 

मगर ये दिल तिरी जानिब से साफ़ भी न हुआ 

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तअ'ल्लुक़ात के बर्ज़ख़ में ही रखा मुझ को 

वो मेरे हक़ में न था और ख़िलाफ़ भी न हुआ 

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अजब था जुर्म-ए-मोहब्बत कि जिस पे दिल ने मिरे 

सज़ा भी पाई नहीं और मुआ'फ़ भी न हुआ 

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मलामतों में कहाँ साँस ले सकेंगे वो लोग 

कि जिन से कू-ए-जफ़ा का तवाफ़ भी न हुआ 

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अजब नहीं है कि दिल पर जमी मिली काई 

बहुत दिनों से तो ये हौज़ साफ़ भी न हुआ 

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हवा-ए-दहर हमें किस लिए बुझाती है 

हमें तो तुझ से कभी इख़्तिलाफ़ भी न हुआ 

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  • 16-Jul-2017
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Parveen Shakir - Ab Bhala Chod Ke Ghar Kya Karte

अब भला छोड़ के घर क्या करते 

शाम के वक़्त सफ़र क्या करते 

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तेरी मसरूफ़ियतें जानते हैं 

अपने आने की ख़बर क्या करते 

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जब सितारे ही नहीं मिल पाए 

ले के हम शम्स-ओ-क़मर क्या करते 

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वो मुसाफ़िर ही खुली धूप का था 

साए फैला के शजर क्या करते 

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ख़ाक ही अव्वल ओ आख़िर ठहरी 

कर के ज़र्रे को गुहर क्या करते 

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राय पहले से बना ली तू ने 

दिल में अब हम तिरे घर क्या करते 

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इश्क़ ने सारे सलीक़े बख़्शे 

हुस्न से कस्ब-ए-हुनर क्या करते 

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  • 16-Jul-2017
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Munauwar Rana - Aap ko chehre se bhi beemar hona chahiye

आप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए 

इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए 

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आप दरिया हैं तो फिर इस वक़्त हम ख़तरे में हैं 

आप कश्ती हैं तो हम को पार होना चाहिए 

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ऐरे-ग़ैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों 

आप को औरत नहीं अख़बार होना चाहिए 

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ज़िंदगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें 

टूटा-फूटा ही सही घर-बार होना चाहिए 

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अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दे मुझे 

इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए 

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  • 16-Jul-2017
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Allama Iqbal - Tujhe yaad kya nahi hai mere dil ka wo zamana

तुझे याद क्या नहीं है मिरे दिल का वो ज़माना 

वो अदब-गह-ए-मोहब्बत वो निगह का ताज़ियाना 

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ये बुतान-ए-अस्र-ए-हाज़िर कि बने हैं मदरसे में 

न अदा-ए-काफ़िराना न तराश-ए-आज़राना 

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नहीं इस खुली फ़ज़ा में कोई गोशा-ए-फ़राग़त 

ये जहाँ अजब जहाँ है न क़फ़स न आशियाना 

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रग-ए-ताक मुंतज़िर है तिरी बारिश-ए-करम की 

कि अजम के मय-कदों में न रही मय-ए-मुग़ाना 

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मिरे हम-सफ़ीर इसे भी असर-ए-बहार समझे 

उन्हें क्या ख़बर कि क्या है ये नवा-ए-आशिक़ाना 

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मिरे ख़ाक ओ ख़ूँ से तू ने ये जहाँ किया है पैदा 

सिला-ए-शहीद क्या है तब-ओ-ताब-ए-जावेदाना 

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तिरी बंदा-परवरी से मिरे दिन गुज़र रहे हैं 

न गिला है दोस्तों का न शिकायत-ए-ज़माना 

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  • 16-Jul-2017
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Josh Malihabadi - Behoshiyo.n ne aor khabardar kar dia

बेहोशियों ने और ख़बरदार कर दिया 

सोई जो अक़्ल रूह ने बेदार कर दिया 

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अल्लाह रे हुस्न-ए-दोस्त की आईना-दारियाँ 

अहल-ए-नज़र को नक़्श-ब-दीवार कर दिया 

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या रब ये भेद क्या है कि राहत की फ़िक्र ने 

इंसाँ को और ग़म में गिरफ़्तार कर दिया 

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दिल कुछ पनप चला था तग़ाफ़ुल की रस्म से 

फिर तेरे इल्तिफ़ात ने बीमार कर दिया 

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कल उन के आगे शरह-ए-तमन्ना की आरज़ू 

इतनी बढ़ी कि नुत्क़ को बेकार कर दिया 

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मुझ को वो बख़्शते थे दो आलम की नेमतें 

मेरे ग़ुरूर-ए-इश्क़ ने इंकार कर दिया 

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ये देख कर कि उन को है रंगीनियों का शौक़ 

आँखों को हम ने दीदा-ए-ख़ूँ-बार कर दिया 

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  • 16-Jul-2017
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Josh Malihabadi - Fir sir kisi ke dar pe jhukae hue hai hum

फिर सर किसी के दर पे झुकाए हुए हैं हम

पर्दे फिर आसमाँ के उठाए हुए हैं हम

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छाई हुई है इश्क़ की फिर दिल पे बे-ख़ुदी

फिर ज़िंदगी को होश में लाए हुए हैं हम

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जिस का हर एक जुज़्व है इक्सीर-ए-ज़िंदगी

फिर ख़ाक में वो जिंस मिलाए हुए हैं हम

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हाँ कौन पूछता है ख़ुशी का नहुफ़्ता राज़

फिर ग़म का बार दिल पे उठाए हुए हैं हम

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हाँ कौन दर्स-ए-इश्क़-ए-जुनूँ का है ख़्वास्त-गार

आए कि हर सबक़ को भुलाए हुए हैं हम

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आए जिसे हो जादा-ए-रिफ़अत की आरज़ू

फिर सर किसी के दर पे झुकाए हुए हैं हम

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बैअत को आए जिस को हो तहक़ीक़ का ख़याल

कौन-ओ-मकाँ के राज़ को पाए हुए हैं हम

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हस्ती के दाम-ए-सख़्त से उकता गया है कौन

कह दो कि फिर गिरफ़्त में आए हुए हैं हम

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हाँ किस के पा-ए-दिल में है ज़ंजीर-ए-आब-ओ-गिल

कह दो कि दाम-ए-ज़ुल्फ़ में आए हुए हैं हम

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हाँ किस को जुस्तुजू है नसीम-ए-फ़राग़ की

आसूदगी को आग लगाए हुए हैं हम

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हाँ किस को सैर-ए-अर्ज़-ओ-समा का है इश्तियाक़

धूनी फिर उस गली में रमाए हुए हैं हम

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जिस पर निसार कौन-ओ-मकाँ की हक़ीक़तें

फिर 'जोश' उस फ़रेब में आए हुए हैं हम

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  • 15-Jul-2017
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Rahat Indori - Uski Kaththai aa.nkho me hai jantar mantar sab

उसकी कत्थई आँखों में हैं जंतर मंतर सब

उसकी कत्थई आँखों में हैं जंतर मंतर सब
चाक़ू वाक़ू, छुरियां वुरियां, ख़ंजर वंजर सब

जिस दिन से तुम रूठीं,मुझ से, रूठे रूठे हैं
चादर वादर, तकिया वकिया, बिस्तर विस्तर सब

मुझसे बिछड़ कर, वह भी कहां अब पहले जैसी है
फीके पड़ गए कपड़े वपड़े, ज़ेवर वेवर सब

जाने मैं किस दिन डूबूँगा, फिक्रें करते हैं
दरिया वरीया,  कश्ती वस्ती, लंगर वंगर सब

इश्क़ विश्क़ के सारे नुस्खे, मुझसे सीखते हैं
सागर वागर, मंज़र वंजर, जोहर वोहर सब

तुलसी ने जो लिखा अब कुछ बदला बदला हैं
रावण वावण, लंका वंका, बन्दर वंदर  सब

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  • 14-Jul-2017
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Mujhe Dubo ke bahut sharmsar rahti hai

mujhe Dubo ke bahut sharmsar rahti hai 

vo ek mauj jo dariya ke paar rahti hai 

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hamare taaq bhi be-zar hai.n ujalo.n se 

diye ki lau bhi hava par savar rahti hai 

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phir us ke ba.ad vahi baasi manzaro.n ke julus 

bahar chand hi lamhe bahar rahti hai 

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isi se qarz chuka.e hai.n mai.n ne sadiyo.n ke 

ye zindagi jo hamesha udhar rahti hai 

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hamari shahr ke danishvaro.n se yaari hai 

isi liye to qaba taar taar rahti hai 

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mujhe ḳharidne vaalo qatar me.n aao 

vo chiiz huu.n jo pas-e-ishtihar rahti hai 

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  • 14-Jul-2017
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Mere karobar me.n sab ne badi imdad ki

mere karobar me.n sab ne baḌi imdad ki 

daad logo.n ki gala apna ġhazal ustad ki 

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apni sa.nse.n bech kar mai.n ne jise abad ki 

vo gali jannat to ab bhi hai magar shaddad ki 

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umr bhar chalte rahe a.nkho.n pe paTTi ba.ndh kar 

zindagi ko Dhu.nDne me.n zindagi barbad ki 

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dastano.n ke sabhi kirdar kam hone lage 

aaj kaġhaz chunti phirti hai pari baġhdad ki 

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ik sulagta chiḳhta mahaul hai aur kuchh nahi.n 

baat karte ho 'yagana' kis aminabad ki

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  • 14-Jul-2017
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Masjido.n ke sahn tak jaana bahut dushvar tha

masjido.n ke sahn tak jaana bahut dushvar tha 

dair se nikla to mere raste me.n daar tha 

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dekhte hi dekhte shahro.n ki raunaq ban gaya 

kal yahi chehra hamare a.ino.n par baar tha 

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apni qismat me.n likhi thi dhuup ki narazgi 

saya-e-divar tha lekin pas-e-divar tha 

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sab ke dukh sukh us ke chehre par likhe paa.e ga.e 

aadmi kya tha hamare shahr ka aḳhbar tha 

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ab mohalle bhar ke darvazo.n pe dastak hai nasib 

ik zamana tha ki jab mai.n bhi bahut ḳhuddar tha

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  • 14-Jul-2017
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