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Josh Malihabadi - Udhar Mazhab Idhar Insa.n Ki fitrat Ka Taqaza Hai

उधर मज़हब इधर इंसाँ की फ़ितरत का तक़ाज़ा है 

वो दामान-ए-मह-ए-कनआँ है ये दस्त-ए-ज़ुलेख़ा है 

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इधर तेरी मशिय्यत है उधर हिकमत रसूलों की 

इलाही आदमी के बाब में क्या हुक्म होता है 

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ये माना दोनों ही धोके हैं रिंदी हो कि दरवेशी 

मगर ये देखना है कौन सा रंगीन धोका है 

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खिलौना तो निहायत शोख़ ओ रंगीं है तमद्दुन का 

मुआर्रिफ़ मैं भी हूँ लेकिन खिलौना फिर खिलौना है 

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मिरे आगे तो अब कुछ दिन से हर आँसू मोहब्बत का 

कनार-ए-आब-ए-रुक्नाबाद ओ गुलगश्त-ए-मुसल्ला है 

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मुझे मालूम है जो कुछ तमन्ना है रसूलों की 

मगर क्या दर-हक़ीक़त वो ख़ुदा की भी तमन्ना है 

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मशिय्यत खेलना ज़ेबा नहीं मेरी बसीरत से 

उठा ले इन खिलौनों को ये दुनिया है वो उक़्बा है 

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  • 16-Jul-2017
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Josh Malihabadi - Behoshiyo.n ne aor khabardar kar dia

बेहोशियों ने और ख़बरदार कर दिया 

सोई जो अक़्ल रूह ने बेदार कर दिया 

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अल्लाह रे हुस्न-ए-दोस्त की आईना-दारियाँ 

अहल-ए-नज़र को नक़्श-ब-दीवार कर दिया 

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या रब ये भेद क्या है कि राहत की फ़िक्र ने 

इंसाँ को और ग़म में गिरफ़्तार कर दिया 

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दिल कुछ पनप चला था तग़ाफ़ुल की रस्म से 

फिर तेरे इल्तिफ़ात ने बीमार कर दिया 

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कल उन के आगे शरह-ए-तमन्ना की आरज़ू 

इतनी बढ़ी कि नुत्क़ को बेकार कर दिया 

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मुझ को वो बख़्शते थे दो आलम की नेमतें 

मेरे ग़ुरूर-ए-इश्क़ ने इंकार कर दिया 

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ये देख कर कि उन को है रंगीनियों का शौक़ 

आँखों को हम ने दीदा-ए-ख़ूँ-बार कर दिया 

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  • 16-Jul-2017
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Josh Malihabadi - Ai malihabad ke rangi.n gulista.n alwida

ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

अलविदा ऐ सरज़मीन-ए-सुबह-ए-खन्दां अलविदा

अलविदा ऐ किशवर-ए-शेर-ओ-शबिस्तां अलविदा

अलविदा ऐ जलवागाहे हुस्न-ए-जानां अलविदा

तेरे घर से एक ज़िन्दा लाश उठ जाने को है

आ गले मिल लें कि आवाज़-ए-जरस आने को है

ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

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हाय क्या-क्या नेमतें मिली थीं मुझ को बेबहा

यह खामोशी यह खुले मैदान यह ठन्डी हवा

वाए, यह जां बख्श गुस्ताहाए रंगीं फ़िज़ां

मर के भी इनको न भूलेगा दिल-ए-दर्द आशना

मस्त कोयल जब दकन की वादियों में गायेगी

यह सुबह की छांव बगुलों की बहुत याद आएगी

ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

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कल से कौन इस बाग़ को रंगीं बनाने आएगा

कौन फूलों की हंसी पर मुस्कुराने आएगा

कौन इस सब्ज़े को सोते से जगाने आएगा

कौन जागेगा क़मर के नाज़ उठाने के लिये

चांदनी रात को ज़ानू पर सुलाने के लिये

ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

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आम के बाग़ों में जब बरसात होगी पुरखरोश

मेरी फ़ुरक़त में लहू रोएगी चश्मे मय फ़रामोश

रस की बूंदें जब उड़ा देंगी गुलिस्तानों के होश

कुंज-ए-रंगीं में पुकारेंगी हवाएँ 'जोश जोश'

सुन के मेरा नाम मौसम ग़मज़दा हो जाएगा

एक महशर सा गुलिस्तां में बपा हो जाएगा

ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

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आ गले मिल लें खुदा हाफ़िज़ गुलिस्तान-ए-वतन

ऐ अमानीगंज के मैदान ऐ जान-ए-वतन

अलविदा ऐ लालाज़ार-ओ-सुम्बुलिस्तान-ए-वतन

अस्सलाम ऐ सोह्बत-ए-रंगीं-ए-यारान-ए-वतन

हश्र तक रहने न देना तुम दकन की खाक में

दफ़न करना अपने शाएर को वतन की खाक में

ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

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  • 15-Jul-2017
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Josh Malihabadi- Ibadat karte hai jo log jannat ki tamanna me

इबादत करते हैं जो लोग जन्नत की तमन्ना में

इबादत तो नहीं है इक तरह की वो तिजारत है

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जो डर के नार-ए-दोज़ख़ से ख़ुदा का नाम लेते हैं

इबादत क्या वो ख़ाली बुज़दिलाना एक ख़िदमत है

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मगर जब शुक्र-ए-ने'मत में जबीं झुकती है बन्दे की

वो सच्ची बन्दगी है इक शरीफ़ाना इत'अत है

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कुचल दे हसरतों को बेनियाज़-ए-मुद्दा हो जा

ख़ुदी को झाड़ दे दामन से मर्द-ए-बाख़ुदा हो जा

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उठा लेती हैं लहरें तहनशीं होता है जब कोई

उभरना है तो ग़र्क़-ए-बह्र-ए-फ़ना हो जा

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  • 15-Jul-2017
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Josh Malihabadi - Fir sir kisi ke dar pe jhukae hue hai hum

फिर सर किसी के दर पे झुकाए हुए हैं हम

पर्दे फिर आसमाँ के उठाए हुए हैं हम

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छाई हुई है इश्क़ की फिर दिल पे बे-ख़ुदी

फिर ज़िंदगी को होश में लाए हुए हैं हम

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जिस का हर एक जुज़्व है इक्सीर-ए-ज़िंदगी

फिर ख़ाक में वो जिंस मिलाए हुए हैं हम

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हाँ कौन पूछता है ख़ुशी का नहुफ़्ता राज़

फिर ग़म का बार दिल पे उठाए हुए हैं हम

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हाँ कौन दर्स-ए-इश्क़-ए-जुनूँ का है ख़्वास्त-गार

आए कि हर सबक़ को भुलाए हुए हैं हम

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आए जिसे हो जादा-ए-रिफ़अत की आरज़ू

फिर सर किसी के दर पे झुकाए हुए हैं हम

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बैअत को आए जिस को हो तहक़ीक़ का ख़याल

कौन-ओ-मकाँ के राज़ को पाए हुए हैं हम

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हस्ती के दाम-ए-सख़्त से उकता गया है कौन

कह दो कि फिर गिरफ़्त में आए हुए हैं हम

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हाँ किस के पा-ए-दिल में है ज़ंजीर-ए-आब-ओ-गिल

कह दो कि दाम-ए-ज़ुल्फ़ में आए हुए हैं हम

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हाँ किस को जुस्तुजू है नसीम-ए-फ़राग़ की

आसूदगी को आग लगाए हुए हैं हम

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हाँ किस को सैर-ए-अर्ज़-ओ-समा का है इश्तियाक़

धूनी फिर उस गली में रमाए हुए हैं हम

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जिस पर निसार कौन-ओ-मकाँ की हक़ीक़तें

फिर 'जोश' उस फ़रेब में आए हुए हैं हम

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  • 15-Jul-2017
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