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Behen Shayari -kisi ke zaḳhm par chahat se patti kaun bandhega

kisi ke zaḳhm par chahat se patti kaun bandhega

agar bahnen nahīn hongī to rakhi kaun bandhega

By- Munauwar Rana

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  • 29-Jul-2017
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Munauwar Rana - Haa.n Ijazat Hai Agar Koi Kahani Aor Hai

हाँ इजाज़त है अगर कोई कहानी और है 

इन कटोरों में अभी थोड़ा सा पानी और है 

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मज़हबी मज़दूर सब बैठे हैं इन को काम दो 

एक इमारत शहर में काफ़ी पुरानी और है 

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ख़ामुशी कब चीख़ बन जाए किसे मालूम है 

ज़ुल्म कर लो जब तलक ये बे-ज़बानी और है 

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ख़ुश्क पत्ते आँख में चुभते हैं काँटों की तरह 

दश्त में फिरना अलग है बाग़बानी और है 

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फिर वही उक्ताहटें होंगी बदन चौपाल में 

उम्र के क़िस्से में थोड़ी सी जवानी और है 

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बस इसी एहसास की शिद्दत ने बूढ़ा कर दिया 

टूटे-फूटे घर में इक लड़की सियानी और है 

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  • 16-Jul-2017
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Munauwar Rana - Kisi Ko Ghar Mila Hisse Me Ya Koi Duka.n Aai

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई 

मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में माँ आई 

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यहाँ से जाने वाला लौट कर कोई नहीं आया 

मैं रोता रह गया लेकिन न वापस जा के माँ आई 

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अधूरे रास्ते से लौटना अच्छा नहीं होता 

बुलाने के लिए दुनिया भी आई तो कहाँ आई 

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किसी को गाँव से परदेस ले जाएगी फिर शायद 

उड़ाती रेल-गाड़ी ढेर सारा फिर धुआँ आई 

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मिरे बच्चों में सारी आदतें मौजूद हैं मेरी 

तो फिर इन बद-नसीबों को न क्यूँ उर्दू ज़बाँ आई 

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क़फ़स में मौसमों का कोई अंदाज़ा नहीं होता 

ख़ुदा जाने बहार आई चमन में या ख़िज़ाँ आई 

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घरौंदे तो घरौंदे हैं चटानें टूट जाती हैं 

उड़ाने के लिए आँधी अगर नाम-ओ-निशाँ आई 

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कभी ऐ ख़ुश-नसीबी मेरे घर का रुख़ भी कर लेती 

इधर पहुँची उधर पहुँची यहाँ आई वहाँ आई 

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  • 16-Jul-2017
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Munauwar Rana - Ana Hawas Ki Dukaano.n Me Aake Baith Gayi

अना हवस की दुकानों में आ के बैठ गई 

अजीब मैना है शिकरों में आ के बैठ गई 

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जगा रहा है ज़माना मगर नहीं खुलतीं 

कहाँ की नींद इन आँखों में आ के बैठ गई 

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वो फ़ाख़्ता जो मुझे देखते ही उड़ती थी 

बड़े सलीक़े से बच्चों में आ के बैठ गई 

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तमाम तल्ख़ियाँ साग़र में रक़्स करने लगीं 

तमाम गर्द किताबों में आ के बैठ गई 

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तमाम शहर में मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू है यही 

कि शाहज़ादी ग़ुलामों में आ के बैठ गई 

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नहीं थी दूसरी कोई जगह भी छुपने की 

हमारी उम्र खिलौनों में आ के बैठ गई 

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उठो कि ओस की बूँदें जगा रही हैं तुम्हें 

चलो कि धूप दरीचों में आ के बैठ गई 

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चली थी देखने सूरज की बद-मिज़ाजी को 

मगर ये ओस भी फूलों में आ के बैठ गई 

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तुझे मैं कैसे बताऊँ कि शाम होते ही 

उदासी कमरे के ताक़ों में आ के बैठ गई 

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  • 16-Jul-2017
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Munauwar Rana - Aap ko chehre se bhi beemar hona chahiye

आप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए 

इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए 

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आप दरिया हैं तो फिर इस वक़्त हम ख़तरे में हैं 

आप कश्ती हैं तो हम को पार होना चाहिए 

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ऐरे-ग़ैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों 

आप को औरत नहीं अख़बार होना चाहिए 

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ज़िंदगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें 

टूटा-फूटा ही सही घर-बार होना चाहिए 

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अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दे मुझे 

इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए 

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  • 16-Jul-2017
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