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Allama Iqbal - Ameen-e-raaz hai mardan-e-hoor ki darveshi

अमीन-ए-राज़ है मर्दान-ए-हूर की दरवेशी 

कि जिबरईल से है उस को निस्बत-ए-ख़्वेशी 

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किसे ख़बर कि सफ़ीने डुबो चुकी कितने 

फ़क़ीह ओ सूफ़ी ओ शाइर की ना-ख़ुश-अंदेशी 

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निगाह-ए-गर्म कि शेरों के जिस से होश उड़ जाएँ 

न आह-ए-सर्द कि है गोसफ़ंदी ओ मेशी 

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तबीब-ए-इश्क़ ने देखा मुझे तो फ़रमाया 

तिरा मरज़ है फ़क़त आरज़ू की बे-नीशी 

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वो शय कुछ और है कहते हैं जान-ए-पाक जिसे 

ये रंग ओ नम ये लहू आब ओ नाँ की है बेशी 

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Duniya Shayari

Posted In : Allama Iqbal

16-Jul-2017
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