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Allama Iqbal - Dil soz se khali hai nigah paak nahi hai

दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है 

फिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है 

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है ज़ौक़-ए-तजल्ली भी इसी ख़ाक में पिन्हाँ 

ग़ाफ़िल तू निरा साहिब-ए-इदराक नहीं है 

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वो आँख कि है सुर्मा-ए-अफ़रंग से रौशन 

पुरकार ओ सुख़न-साज़ है नमनाक नहीं है 

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क्या सूफ़ी ओ मुल्ला को ख़बर मेरे जुनूँ की 

उन का सर-ए-दामन भी अभी चाक नहीं है 

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कब तक रहे महकूमी-ए-अंजुम में मिरी ख़ाक 

या मैं नहीं या गर्दिश-ए-अफ़्लाक नहीं है 

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बिजली हूँ नज़र कोह ओ बयाबाँ पे है मेरी 

मेरे लिए शायाँ ख़स-ओ-ख़ाशाक नहीं है 

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आलम है फ़क़त मोमिन-ए-जाँबाज़ की मीरास 

मोमिन नहीं जो साहिब-ए-लौलाक नहीं है 

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Khuda Shayari zindagi Duniya Shayari

Posted In : Allama Iqbal

16-Jul-2017
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