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Josh Malihabadi - Udhar Mazhab Idhar Insa.n Ki fitrat Ka Taqaza Hai

उधर मज़हब इधर इंसाँ की फ़ितरत का तक़ाज़ा है 

वो दामान-ए-मह-ए-कनआँ है ये दस्त-ए-ज़ुलेख़ा है 

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इधर तेरी मशिय्यत है उधर हिकमत रसूलों की 

इलाही आदमी के बाब में क्या हुक्म होता है 

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ये माना दोनों ही धोके हैं रिंदी हो कि दरवेशी 

मगर ये देखना है कौन सा रंगीन धोका है 

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खिलौना तो निहायत शोख़ ओ रंगीं है तमद्दुन का 

मुआर्रिफ़ मैं भी हूँ लेकिन खिलौना फिर खिलौना है 

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मिरे आगे तो अब कुछ दिन से हर आँसू मोहब्बत का 

कनार-ए-आब-ए-रुक्नाबाद ओ गुलगश्त-ए-मुसल्ला है 

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मुझे मालूम है जो कुछ तमन्ना है रसूलों की 

मगर क्या दर-हक़ीक़त वो ख़ुदा की भी तमन्ना है 

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मशिय्यत खेलना ज़ेबा नहीं मेरी बसीरत से 

उठा ले इन खिलौनों को ये दुनिया है वो उक़्बा है 

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Duniya Shayari

Posted In : Josh Malihabadi

16-Jul-2017
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