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Momin Khan Monin - Ai Aarzu-e-Qatl Zara DIl Ko Thamna

ऐ आरज़ू-ए-क़त्ल ज़रा दिल को थामना 

मुश्किल पड़ा मिरा मिरे क़ातिल को थामना 

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तासीर-ए-बे-क़रारी-ए-नाकाम आफ़रीं 

है काम उन से शोख़-ए-शमाइल को थामना 

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देखे है चाँदनी वो ज़मीं पर न गिर पड़े 

ऐ चर्ख़ अपने तू मह-ए-कामिल को थामना 

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मुज़्तर हूँ किस का तर्ज़-ए-सुख़न से समझ गया 

अब ज़िक्र क्या है सामा-ए-आक़िल को थामना 

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हो सरसर-ए-फ़ुग़ाँ से न क्यूँकर वो मुज़्तरिब 

मुश्किल हुआ है पर्दा-ए-महमिल को थामना 

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सीखे हैं मुझ से नाला-ए-नय आसमाँ-शिकन 

सय्याद अब क़फ़स में अनादिल को थामना 

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ये ज़ुल्फ़ ख़म-ब-ख़म न हो क्या ताब-ए-ग़ैर है 

तेरे जुनूँ-ज़दे की सलासिल को थामना 

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ऐ हमदम आह तल्ख़ी-ए-हिज्राँ से दम नहीं 

गिरता है देख जाम-ए-हलाहिल को थामना 

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सीमाब-वार मर गए ज़ब्त-ए-क़लक़ से हम 

क्या क़हर है तबीअत-ए-माइल को थामना 

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आग़ोश-ए-गोर हो गई आख़िर लहूलुहान 

आसाँ नहीं है आप के बिस्मिल को थामना 

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सीने पे हाथ धरते ही कुछ दम पे बन गई 

लो जान का अज़ाब हुआ दिल को थामना 

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बाक़ी है शौक़-ए-चाक-ए-गरेबाँ अभी मुझे 

बस ऐ रफ़ूगर अपनी अनामिल को थामना 

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मत माँगियो अमान बुतों से कि है हराम 

'मोमिन' ज़बान-ए-बेहूदा साइल को थामना 

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Love Shayari Sad Shayari

Posted In : Momin Khan Momin

17-Jul-2017
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