Bootstrap Image Preview

Munauwar Rana - Ana Hawas Ki Dukaano.n Me Aake Baith Gayi

अना हवस की दुकानों में आ के बैठ गई 

अजीब मैना है शिकरों में आ के बैठ गई 

-----------------*------------------

जगा रहा है ज़माना मगर नहीं खुलतीं 

कहाँ की नींद इन आँखों में आ के बैठ गई 

-----------------*------------------

वो फ़ाख़्ता जो मुझे देखते ही उड़ती थी 

बड़े सलीक़े से बच्चों में आ के बैठ गई 

-----------------*------------------

तमाम तल्ख़ियाँ साग़र में रक़्स करने लगीं 

तमाम गर्द किताबों में आ के बैठ गई 

-----------------*------------------

तमाम शहर में मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू है यही 

कि शाहज़ादी ग़ुलामों में आ के बैठ गई 

-----------------*------------------

नहीं थी दूसरी कोई जगह भी छुपने की 

हमारी उम्र खिलौनों में आ के बैठ गई 

-----------------*------------------

उठो कि ओस की बूँदें जगा रही हैं तुम्हें 

चलो कि धूप दरीचों में आ के बैठ गई 

-----------------*------------------

चली थी देखने सूरज की बद-मिज़ाजी को 

मगर ये ओस भी फूलों में आ के बैठ गई 

-----------------*------------------

तुझे मैं कैसे बताऊँ कि शाम होते ही 

उदासी कमरे के ताक़ों में आ के बैठ गई 

-----------------*------------------

Dard Shayari Sad Shayari zindagi Duniya Shayari

Posted In : Munawwar Rana

16-Jul-2017
330 views

0 Comments