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Parveen Shakir - Agarche Tujh se Bahot Ikhtelaaf Bhi Na Hua

अगरचे तुझ से बहुत इख़्तिलाफ़ भी न हुआ 

मगर ये दिल तिरी जानिब से साफ़ भी न हुआ 

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तअ'ल्लुक़ात के बर्ज़ख़ में ही रखा मुझ को 

वो मेरे हक़ में न था और ख़िलाफ़ भी न हुआ 

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अजब था जुर्म-ए-मोहब्बत कि जिस पे दिल ने मिरे 

सज़ा भी पाई नहीं और मुआ'फ़ भी न हुआ 

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मलामतों में कहाँ साँस ले सकेंगे वो लोग 

कि जिन से कू-ए-जफ़ा का तवाफ़ भी न हुआ 

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अजब नहीं है कि दिल पर जमी मिली काई 

बहुत दिनों से तो ये हौज़ साफ़ भी न हुआ 

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हवा-ए-दहर हमें किस लिए बुझाती है 

हमें तो तुझ से कभी इख़्तिलाफ़ भी न हुआ 

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Love Shayari Dard Shayari Yaad Shayari

Posted In : Parveen Shakir

16-Jul-2017
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