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Waseem Barelvi - Lahoo na ho to qalam tarjuma nahi hota

लहू न हो तो क़लम तर्जुमाँ नहीं होता 

हमारे दौर में आँसू ज़बाँ नहीं होता 

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जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा 

किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता 

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ये किस मक़ाम पे लाई है मेरी तन्हाई 

कि मुझ से आज कोई बद-गुमाँ नहीं होता 

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बस इक निगाह मिरी राह देखती होती 

ये सारा शहर मिरा मेज़बाँ नहीं होता 

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तिरा ख़याल न होता तो कौन समझाता 

ज़मीं न हो तो कोई आसमाँ नहीं होता 

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मैं उस को भूल गया हूँ ये कौन मानेगा 

किसी चराग़ के बस में धुआँ नहीं होता 

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'वसीम' सदियों की आँखों से देखिए मुझ को 

वो लफ़्ज़ हूँ जो कभी दास्ताँ नहीं होता 

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zindagi Duniya Shayari

Posted In : Waseem Barelvi

17-Jul-2017
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