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Anamika Amber - Mai Tujhe jaan loo.n, Tu mujhe Jaan Le

Mai.n Tujhe jaan loo.n, Tu mujhe Jaan Le,

Mai.n Bhi Pehchan Loo.n, Tu bhi Pehchan Le,

Hai bahot Hee Saral Pyar Ka Vyakran,

Mai.n Teri Maan Loo.n, Tu meri Maan Le.

 

मैं तुझे जान लूँ, तू मुझे जान ले.

मै भी पहचान लूँ तू भी पहचान ले.

है बहुत ही सरल प्रेम का व्याकरण.

मै तेरी मान लूँ तू मेरी मान ले.

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  • 15-Nov-2017
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Firaq - Aa.i hai kuchh na pūchh qayamat kaha.n kaha.n

aa.i hai kuchh na pūchh qayamat kaha.n kaha.n 

uf le ga.i hai mujh ko mohabbat kaha.n kaha.n 

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betabi-o-sukū.n ki huii.n manzile.n tamam 

bahla.e.n tujh se chhuT ke tabi.at kaha.n kaha.n 

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furqat ho ya visal vahi iztirab hai 

tera asar hai ai ġham-e-furqat kaha.n kaha.n 

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har jumbish-e-nigah me.n sad-kaif be-ḳhudi 

bharti phiregi husn ki niyyat kaha.n kaha.n 

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rah-e-talab me.n chhoḌ diya dil ka saath bhi 

phirte liye hue ye musibat kaha.n kaha.n 

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dil ke ufaq tak ab to hai.n parchha.iya.n tiri 

le jaa.e ab to dekh ye vahshat kaha.n kaha.n 

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ai nargis-e-siyah bata de tire nisar 

kis kis ko hai ye hosh ye ġhaflat kaha.n kaha.n 

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naira.ng-e-ishq ki hai koi intiha ki ye 

ye ġham kaha.n kaha.n ye masarrat kaha.n kaha.n 

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beganagi par us ki zamane se ehtiraz 

dar-parda us ada ki shikayat kaha.n kaha.n 

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farq aa gaya tha daur-e-hayat-o-mamat me.n 

aa.i hai aaj yaad vo sūrat kaha.n kaha.n 

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jaise fana baqa me.n bhi koi kami si ho 

mujh ko paḌi hai teri zarūrat kaha.n kaha.n 

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duniya se ai dal itni tabi.at bhari na thi 

tere liye uTha.i nadamat kaha.n kaha.n 

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ab imtiyaz-e-ishq-o-havas bhi nahi.n raha 

hoti hai teri chashm-e-inayat kaha.n kaha.n 

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har gaam par tariq-e-mohabbat me.n maut thi 

is raah me.n khule dar-e-rahmat kaha.n kaha.n 

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hosh-o-junū.n bhi ab to bas ik baat hai.n 'firaq' 

hoti hai us nazar ki shararat kaha.n kaha.n 

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  • 12-Aug-2017
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Gulzar - Ham to kitno.n ko mah-jabi.n kahte

ham to kitno.n ko mah-jabi.n kahte 

aap hai.n is liye nahi.n kahte 

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chā.nd hotā na āsmā.n pe agar 

ham kise aap sā hasi.n kahte 

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aap ke paa.nv phir kahā.n paḌte 

ham zami.n ko agar zami.n kahte 

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aap ne auro.n se kahā sab kuchh 

ham se bhi kuchh kabhi kahi.n kahte 

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aap ke ba.ad aap hi kahiye 

vaqt ko kaise ham-nashi.n kahte

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vo bhi vāhid hai mai.n bhi vāhid huu.n 

kis sabab se ham āfri.n kahte 

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  • 12-Aug-2017
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Kabhi usne bhi hume chahat ka paigaam likha tha

Kabhi usne bhi hume chahat ka paigaam likha tha,

Sab kuch usne apna hamare naam likha tha,

Suna hai aaj usko hamare zikr se bhi nafrat hai,

Jisne kabhi apne dil pe hamara naam likha tha. cry

कभी उसने भी हमें चाहत का पैगाम लिखा था,
सब कुछ उसने अपना हमारे नाम लिखा था,
सुना हैं आज उनको हमारे जिक्र से भी नफ़रत है,
जिसने कभी अपने दिल पर हमारा नाम लिखा था.

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  • 28-Jul-2017
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Ahmad Faraz- ashiqi men 'mir' jaise ḳhvab mat dekha karo

ashiqi men 'mir' jaise ḳhvab mat dekha karo 

bavle ho jaoge mahtab mat dekha karo 

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jasta jasta paḌh liya karna mazamin-e-vafa 

par kitab-e-ishq ka har baab mat dekha karo 

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is tamashe men ulaT jaati hain aksar kashtiyan 

Dūbne valon ko zer-e-ab mat dekha karo 

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mai-kade men kya takalluf mai-kashi men kya hijab 

bazm-e-saqi men adab adab mat dekha karo 

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ham se durveshon ke ghar aao to yaron ki tarah 

har jagah ḳhas ḳhana o barfab mat dekha karo 

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mange-tange ki qaba.en der tak rahti nahin 

yaar logon ke laqab-alqab mat dekha karo 

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tishnagi men lab bhigo lena bhi kaafi hai 'faraz' 

jaam men sahba hai ya zahrab mat dekha karo

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  • 17-Jul-2017
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Momin Khan Monin - Ai Aarzu-e-Qatl Zara DIl Ko Thamna

ऐ आरज़ू-ए-क़त्ल ज़रा दिल को थामना 

मुश्किल पड़ा मिरा मिरे क़ातिल को थामना 

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तासीर-ए-बे-क़रारी-ए-नाकाम आफ़रीं 

है काम उन से शोख़-ए-शमाइल को थामना 

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देखे है चाँदनी वो ज़मीं पर न गिर पड़े 

ऐ चर्ख़ अपने तू मह-ए-कामिल को थामना 

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मुज़्तर हूँ किस का तर्ज़-ए-सुख़न से समझ गया 

अब ज़िक्र क्या है सामा-ए-आक़िल को थामना 

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हो सरसर-ए-फ़ुग़ाँ से न क्यूँकर वो मुज़्तरिब 

मुश्किल हुआ है पर्दा-ए-महमिल को थामना 

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सीखे हैं मुझ से नाला-ए-नय आसमाँ-शिकन 

सय्याद अब क़फ़स में अनादिल को थामना 

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ये ज़ुल्फ़ ख़म-ब-ख़म न हो क्या ताब-ए-ग़ैर है 

तेरे जुनूँ-ज़दे की सलासिल को थामना 

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ऐ हमदम आह तल्ख़ी-ए-हिज्राँ से दम नहीं 

गिरता है देख जाम-ए-हलाहिल को थामना 

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सीमाब-वार मर गए ज़ब्त-ए-क़लक़ से हम 

क्या क़हर है तबीअत-ए-माइल को थामना 

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आग़ोश-ए-गोर हो गई आख़िर लहूलुहान 

आसाँ नहीं है आप के बिस्मिल को थामना 

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सीने पे हाथ धरते ही कुछ दम पे बन गई 

लो जान का अज़ाब हुआ दिल को थामना 

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बाक़ी है शौक़-ए-चाक-ए-गरेबाँ अभी मुझे 

बस ऐ रफ़ूगर अपनी अनामिल को थामना 

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मत माँगियो अमान बुतों से कि है हराम 

'मोमिन' ज़बान-ए-बेहूदा साइल को थामना 

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  • 17-Jul-2017
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Momin Khan Momin - Asar usko zara nahi hota

असर उस को ज़रा नहीं होता 

रंज राहत-फ़ज़ा नहीं होता 

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बेवफ़ा कहने की शिकायत है 

तो भी वादा-वफ़ा नहीं होता 

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ज़िक्र-ए-अग़्यार से हुआ मालूम 

हर्फ़-ए-नासेह बुरा नहीं होता 

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किस को है ज़ौक़-ए-तल्ख़-कामी लेक 

जंग बिन कुछ मज़ा नहीं होता 

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तुम हमारे किसी तरह न हुए 

वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता 

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उस ने क्या जाने क्या किया ले कर 

दिल किसी काम का नहीं होता 

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इम्तिहाँ कीजिए मिरा जब तक 

शौक़ ज़ोर-आज़मा नहीं होता 

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एक दुश्मन कि चर्ख़ है न रहे 

तुझ से ये ऐ दुआ नहीं होता 

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आह तूल-ए-अमल है रोज़-फ़ुज़ूँ 

गरचे इक मुद्दआ नहीं होता 

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तुम मिरे पास होते हो गोया 

जब कोई दूसरा नहीं होता 

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हाल-ए-दिल यार को लिखूँ क्यूँकर 

हाथ दिल से जुदा नहीं होता 

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रहम बर-ख़स्म-ए-जान-ए-ग़ैर न हो 

सब का दिल एक सा नहीं होता 

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दामन उस का जो है दराज़ तो हो 

दस्त-ए-आशिक़ रसा नहीं होता 

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चारा-ए-दिल सिवाए सब्र नहीं 

सो तुम्हारे सिवा नहीं होता 

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क्यूँ सुने अर्ज़-ए-मुज़्तर ऐ 'मोमिन' 

सनम आख़िर ख़ुदा नहीं होता 

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  • 17-Jul-2017
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Parveen Shakir - Bichda Hai Jo Ik Baar To Milte Nahi Dekha

बिछड़ा है जो इक बार तो मिलते नहीं देखा 

इस ज़ख़्म को हम ने कभी सिलते नहीं देखा 

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इक बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश 

फिर शाख़ पे उस फूल को खिलते नहीं देखा 

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यक-लख़्त गिरा है तो जड़ें तक निकल आईं 

जिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा 

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काँटों में घिरे फूल को चूम आएगी लेकिन 

तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा 

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किस तरह मिरी रूह हरी कर गया आख़िर 

वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा 

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  • 16-Jul-2017
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Parveen Shakir - Agarche Tujh se Bahot Ikhtelaaf Bhi Na Hua

अगरचे तुझ से बहुत इख़्तिलाफ़ भी न हुआ 

मगर ये दिल तिरी जानिब से साफ़ भी न हुआ 

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तअ'ल्लुक़ात के बर्ज़ख़ में ही रखा मुझ को 

वो मेरे हक़ में न था और ख़िलाफ़ भी न हुआ 

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अजब था जुर्म-ए-मोहब्बत कि जिस पे दिल ने मिरे 

सज़ा भी पाई नहीं और मुआ'फ़ भी न हुआ 

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मलामतों में कहाँ साँस ले सकेंगे वो लोग 

कि जिन से कू-ए-जफ़ा का तवाफ़ भी न हुआ 

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अजब नहीं है कि दिल पर जमी मिली काई 

बहुत दिनों से तो ये हौज़ साफ़ भी न हुआ 

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हवा-ए-दहर हमें किस लिए बुझाती है 

हमें तो तुझ से कभी इख़्तिलाफ़ भी न हुआ 

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  • 16-Jul-2017
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Parveen Shakir - Ab Bhala Chod Ke Ghar Kya Karte

अब भला छोड़ के घर क्या करते 

शाम के वक़्त सफ़र क्या करते 

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तेरी मसरूफ़ियतें जानते हैं 

अपने आने की ख़बर क्या करते 

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जब सितारे ही नहीं मिल पाए 

ले के हम शम्स-ओ-क़मर क्या करते 

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वो मुसाफ़िर ही खुली धूप का था 

साए फैला के शजर क्या करते 

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ख़ाक ही अव्वल ओ आख़िर ठहरी 

कर के ज़र्रे को गुहर क्या करते 

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राय पहले से बना ली तू ने 

दिल में अब हम तिरे घर क्या करते 

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इश्क़ ने सारे सलीक़े बख़्शे 

हुस्न से कस्ब-ए-हुनर क्या करते 

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  • 16-Jul-2017
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