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Khumar - baat jab doston ki aati hai

baat jab dostoñ kī aatī hai 

dostī kaañp kaañp jaatī hai 

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mujh se ai dost phir ḳhafā ho jā 

ishq ko niiñd aa.ī jaatī hai 

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ab qayāmat se kyā Dare koī 

ab qayāmat to roz aatī hai 

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bhāgtā huuñ maiñ zindagī se 'ḳhumār' 

aur ye nāgin Dase hī jaatī hai 

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  • 17-Jul-2017
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Khumar - aisa nahi.n ki un se mohabbat nahi.n rahi

aisā nahī.n ki un se mohabbat nahī.n rahī 

jazbāt me.n vo pahlī sī shiddat nahī.n rahī 

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zof-e-quvā ne āmad-e-pīrī kī dī naved 

vo dil nahī.n rahā vo tabī.at nahī.n rahī 

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sar me.n vo intizār kā saudā nahī.n rahā 

dil par vo dhaḌkano.n kī hukūmat nahī.n rahī 

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kamzorī-e-nigāh ne sanjīda kar diyā 

jalvo.n se chheḌ-chhāḌ kī aadat nahī.n rahī 

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hātho.n se intiqām liyā irti.āsh ne 

dāmān-e-yār se koī nisbat nahī.n rahī 

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paiham tavāf-e-kūcha-e-jānā.n ke din ga.e 

pairo.n me.n chalne phirne kī tāqat nahī.n rahī 

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chehre ko jhurriyo.n ne bhayānak banā diyā 

ā.īna dekhne kī bhī himmat nahī.n rahī 

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allāh jaane maut kahā.n mar ga.ī 'ḳhumār' 

ab mujh ko zindagī kī zarūrat nahī.n rahī 

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  • 17-Jul-2017
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Khumar - ai maut unhe.n bhula.e zamane guzar ga.e

ai maut unheñ bhulā.e zamāne guzar ga.e 

aa jā ki zahr khaa.e zamāne guzar ga.e 

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o jaane vaale aa ki tire intizār meñ 

raste ko ghar banā.e zamāne guzar ga.e 

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ġham hai na ab ḳhushī hai na ummīd hai na yaas 

sab se najāt paa.e zamāne guzar ga.e 

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kyā lā.iq-e-sitam bhī nahīñ ab maiñ dosto 

patthar bhī ghar meñ aa.e zamāne guzar ga.e 

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jān-e-bahār phuul nahīñ aadmī huuñ maiñ 

aa jā ki muskurā.e zamāne guzar ga.e 

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kyā kyā tavaqquāt thiiñ aahoñ se ai 'ḳhumār' 

ye tiir bhī chalā.e zamāne guzar ga.e 

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  • 17-Jul-2017
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Parveen Shakir - Bichda Hai Jo Ik Baar To Milte Nahi Dekha

बिछड़ा है जो इक बार तो मिलते नहीं देखा 

इस ज़ख़्म को हम ने कभी सिलते नहीं देखा 

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इक बार जिसे चाट गई धूप की ख़्वाहिश 

फिर शाख़ पे उस फूल को खिलते नहीं देखा 

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यक-लख़्त गिरा है तो जड़ें तक निकल आईं 

जिस पेड़ को आँधी में भी हिलते नहीं देखा 

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काँटों में घिरे फूल को चूम आएगी लेकिन 

तितली के परों को कभी छिलते नहीं देखा 

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किस तरह मिरी रूह हरी कर गया आख़िर 

वो ज़हर जिसे जिस्म में खिलते नहीं देखा 

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  • 16-Jul-2017
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Parveen Shakir - Agarche Tujh se Bahot Ikhtelaaf Bhi Na Hua

अगरचे तुझ से बहुत इख़्तिलाफ़ भी न हुआ 

मगर ये दिल तिरी जानिब से साफ़ भी न हुआ 

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तअ'ल्लुक़ात के बर्ज़ख़ में ही रखा मुझ को 

वो मेरे हक़ में न था और ख़िलाफ़ भी न हुआ 

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अजब था जुर्म-ए-मोहब्बत कि जिस पे दिल ने मिरे 

सज़ा भी पाई नहीं और मुआ'फ़ भी न हुआ 

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मलामतों में कहाँ साँस ले सकेंगे वो लोग 

कि जिन से कू-ए-जफ़ा का तवाफ़ भी न हुआ 

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अजब नहीं है कि दिल पर जमी मिली काई 

बहुत दिनों से तो ये हौज़ साफ़ भी न हुआ 

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हवा-ए-दहर हमें किस लिए बुझाती है 

हमें तो तुझ से कभी इख़्तिलाफ़ भी न हुआ 

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  • 16-Jul-2017
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Parveen Shakir - Ab Bhala Chod Ke Ghar Kya Karte

अब भला छोड़ के घर क्या करते 

शाम के वक़्त सफ़र क्या करते 

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तेरी मसरूफ़ियतें जानते हैं 

अपने आने की ख़बर क्या करते 

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जब सितारे ही नहीं मिल पाए 

ले के हम शम्स-ओ-क़मर क्या करते 

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वो मुसाफ़िर ही खुली धूप का था 

साए फैला के शजर क्या करते 

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ख़ाक ही अव्वल ओ आख़िर ठहरी 

कर के ज़र्रे को गुहर क्या करते 

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राय पहले से बना ली तू ने 

दिल में अब हम तिरे घर क्या करते 

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इश्क़ ने सारे सलीक़े बख़्शे 

हुस्न से कस्ब-ए-हुनर क्या करते 

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  • 16-Jul-2017
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Munauwar Rana - Haa.n Ijazat Hai Agar Koi Kahani Aor Hai

हाँ इजाज़त है अगर कोई कहानी और है 

इन कटोरों में अभी थोड़ा सा पानी और है 

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मज़हबी मज़दूर सब बैठे हैं इन को काम दो 

एक इमारत शहर में काफ़ी पुरानी और है 

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ख़ामुशी कब चीख़ बन जाए किसे मालूम है 

ज़ुल्म कर लो जब तलक ये बे-ज़बानी और है 

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ख़ुश्क पत्ते आँख में चुभते हैं काँटों की तरह 

दश्त में फिरना अलग है बाग़बानी और है 

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फिर वही उक्ताहटें होंगी बदन चौपाल में 

उम्र के क़िस्से में थोड़ी सी जवानी और है 

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बस इसी एहसास की शिद्दत ने बूढ़ा कर दिया 

टूटे-फूटे घर में इक लड़की सियानी और है 

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  • 16-Jul-2017
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Allama Iqbal - Tujhe yaad kya nahi hai mere dil ka wo zamana

तुझे याद क्या नहीं है मिरे दिल का वो ज़माना 

वो अदब-गह-ए-मोहब्बत वो निगह का ताज़ियाना 

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ये बुतान-ए-अस्र-ए-हाज़िर कि बने हैं मदरसे में 

न अदा-ए-काफ़िराना न तराश-ए-आज़राना 

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नहीं इस खुली फ़ज़ा में कोई गोशा-ए-फ़राग़त 

ये जहाँ अजब जहाँ है न क़फ़स न आशियाना 

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रग-ए-ताक मुंतज़िर है तिरी बारिश-ए-करम की 

कि अजम के मय-कदों में न रही मय-ए-मुग़ाना 

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मिरे हम-सफ़ीर इसे भी असर-ए-बहार समझे 

उन्हें क्या ख़बर कि क्या है ये नवा-ए-आशिक़ाना 

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मिरे ख़ाक ओ ख़ूँ से तू ने ये जहाँ किया है पैदा 

सिला-ए-शहीद क्या है तब-ओ-ताब-ए-जावेदाना 

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तिरी बंदा-परवरी से मिरे दिन गुज़र रहे हैं 

न गिला है दोस्तों का न शिकायत-ए-ज़माना 

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  • 16-Jul-2017
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Josh Malihabadi - Ai malihabad ke rangi.n gulista.n alwida

ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

अलविदा ऐ सरज़मीन-ए-सुबह-ए-खन्दां अलविदा

अलविदा ऐ किशवर-ए-शेर-ओ-शबिस्तां अलविदा

अलविदा ऐ जलवागाहे हुस्न-ए-जानां अलविदा

तेरे घर से एक ज़िन्दा लाश उठ जाने को है

आ गले मिल लें कि आवाज़-ए-जरस आने को है

ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

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हाय क्या-क्या नेमतें मिली थीं मुझ को बेबहा

यह खामोशी यह खुले मैदान यह ठन्डी हवा

वाए, यह जां बख्श गुस्ताहाए रंगीं फ़िज़ां

मर के भी इनको न भूलेगा दिल-ए-दर्द आशना

मस्त कोयल जब दकन की वादियों में गायेगी

यह सुबह की छांव बगुलों की बहुत याद आएगी

ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

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कल से कौन इस बाग़ को रंगीं बनाने आएगा

कौन फूलों की हंसी पर मुस्कुराने आएगा

कौन इस सब्ज़े को सोते से जगाने आएगा

कौन जागेगा क़मर के नाज़ उठाने के लिये

चांदनी रात को ज़ानू पर सुलाने के लिये

ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

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आम के बाग़ों में जब बरसात होगी पुरखरोश

मेरी फ़ुरक़त में लहू रोएगी चश्मे मय फ़रामोश

रस की बूंदें जब उड़ा देंगी गुलिस्तानों के होश

कुंज-ए-रंगीं में पुकारेंगी हवाएँ 'जोश जोश'

सुन के मेरा नाम मौसम ग़मज़दा हो जाएगा

एक महशर सा गुलिस्तां में बपा हो जाएगा

ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

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आ गले मिल लें खुदा हाफ़िज़ गुलिस्तान-ए-वतन

ऐ अमानीगंज के मैदान ऐ जान-ए-वतन

अलविदा ऐ लालाज़ार-ओ-सुम्बुलिस्तान-ए-वतन

अस्सलाम ऐ सोह्बत-ए-रंगीं-ए-यारान-ए-वतन

हश्र तक रहने न देना तुम दकन की खाक में

दफ़न करना अपने शाएर को वतन की खाक में

ऐ मलिहाबाद के रंगीं गुलिस्तां अलविदा

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  • 15-Jul-2017
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Josh Malihabadi - Fir sir kisi ke dar pe jhukae hue hai hum

फिर सर किसी के दर पे झुकाए हुए हैं हम

पर्दे फिर आसमाँ के उठाए हुए हैं हम

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छाई हुई है इश्क़ की फिर दिल पे बे-ख़ुदी

फिर ज़िंदगी को होश में लाए हुए हैं हम

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जिस का हर एक जुज़्व है इक्सीर-ए-ज़िंदगी

फिर ख़ाक में वो जिंस मिलाए हुए हैं हम

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हाँ कौन पूछता है ख़ुशी का नहुफ़्ता राज़

फिर ग़म का बार दिल पे उठाए हुए हैं हम

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हाँ कौन दर्स-ए-इश्क़-ए-जुनूँ का है ख़्वास्त-गार

आए कि हर सबक़ को भुलाए हुए हैं हम

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आए जिसे हो जादा-ए-रिफ़अत की आरज़ू

फिर सर किसी के दर पे झुकाए हुए हैं हम

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बैअत को आए जिस को हो तहक़ीक़ का ख़याल

कौन-ओ-मकाँ के राज़ को पाए हुए हैं हम

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हस्ती के दाम-ए-सख़्त से उकता गया है कौन

कह दो कि फिर गिरफ़्त में आए हुए हैं हम

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हाँ किस के पा-ए-दिल में है ज़ंजीर-ए-आब-ओ-गिल

कह दो कि दाम-ए-ज़ुल्फ़ में आए हुए हैं हम

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हाँ किस को जुस्तुजू है नसीम-ए-फ़राग़ की

आसूदगी को आग लगाए हुए हैं हम

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हाँ किस को सैर-ए-अर्ज़-ओ-समा का है इश्तियाक़

धूनी फिर उस गली में रमाए हुए हैं हम

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जिस पर निसार कौन-ओ-मकाँ की हक़ीक़तें

फिर 'जोश' उस फ़रेब में आए हुए हैं हम

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  • 15-Jul-2017
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